समाज को बांटने वाले बयान राष्ट्रहित के लिए घातक। ओमवीर आर्य ऐडवोकेट
सुन्दर लाल शर्मा गौतम बुद्ध नगर

वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता ओमवीर आर्य ऐडवोकेट ने बताया कि
वर्तमान समय में देश सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक एकता और राष्ट्रीय अखंडता के महत्वपूर्ण दौर से गुजर रहा है। ऐसे समय में सार्वजनिक जीवन से जुड़े नेताओं और जिम्मेदार व्यक्तियों से अपेक्षा की जाती है कि वे अपने शब्दों का चयन अत्यंत सावधानी और जिम्मेदारी के साथ करें। दुर्भाग्यपूर्ण रूप से समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता राजकुमार भाटी द्वारा दिए गए कुछ बयानों ने विभिन्न समाजों में असंतोष और नाराजगी पैदा कर दी है।
ब्राह्मण समाज पर की गई आपत्तिजनक टिप्पणी हो या गुर्जर, जाट और अहीर समाज को लेकर दिए गए कथन, ऐसे शब्द किसी भी सभ्य और लोकतांत्रिक समाज में स्वीकार्य नहीं माने जा सकते। किसी भी समाज की महिलाओं की गरिमा पर प्रश्न उठाना न केवल अनुचित है बल्कि भारतीय संस्कृति और सभ्यता के मूल मूल्यों के भी विपरीत है। भारत की परंपरा सदैव “नारी सम्मान” और “सामाजिक सौहार्द” की रही है। यहां हर समाज ने राष्ट्र निर्माण में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है। राजकुमार भाटी को किसने ये अधिकार दे दिया कि वह गुर्जर और जाट समाज की स्त्री जाती का अपमान करे, वह अपना ज्ञान अपने पास रखे।
वरिष्ठ सामाजिक लोगों और क्षेत्रीय नागरिकों ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति किसी समाज विशेष से आता है तो उसका दायित्व उस समाज के सम्मान और एकता को मजबूत करना होना चाहिए, न कि समाजों के बीच कटुता पैदा करना। लोगों का कहना है कि सार्वजनिक मंचों पर अपमानजनक भाषा का प्रयोग सामाजिक संतुलन को बिगाड़ सकता है।
एक बुजुर्ग सामाजिक कार्यकर्ता कुवंरपाल भाटी ने चर्चा के दौरान बताया कि जब उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड एक साथ हुआ करते थे, तब विधानसभा में ब्रह्मदत्त विधायक जैसे वरिष्ठ ब्राह्मण नेता ने अंग्रेजी शासनकाल से चली आ रही उन धारणाओं को हटाने के लिए आवाज उठाई थी, जिनमें गुर्जर समाज को अपराध से जोड़कर देखा जाता था। ब्रह्मदत्त बाद में केंद्र सरकार में मंत्री भी रहे और उन्होंने सामाजिक सम्मान तथा समानता के लिए महत्वपूर्ण प्रयास किए।
सामाजिक लोगों का कहना है कि इतिहास और धार्मिक प्रसंगों को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। महाभारत और द्रोपदी जैसे उदाहरणों को संदर्भ से हटाकर प्रस्तुत करना भारतीय संस्कृति की गरिमा के विपरीत माना जा रहा है। भारतीय परंपरा में कुंती माता, गांधारी माता तथा अन्य पतिव्रता नारियों के आदर्शों को सदैव सम्मान दिया गया है। इसलिए किसी भी समाज की महिलाओं के बारे में असम्मानजनक टिप्पणी करना पूरे समाज की भावनाओं को ठेस पहुंचाने जैसा है।
लोगों ने कहा कि ब्राह्मण, गुर्जर, जाट, अहीर, राजपूत, वैश्य, दलित और अन्य सभी समाजों ने देश की स्वतंत्रता, संस्कृति और सामाजिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। किसी एक समाज को नीचा दिखाकर राजनीतिक लाभ लेने का प्रयास अंततः सामाजिक विभाजन को जन्म देता है।
समाज के प्रबुद्ध वर्ग का मानना है कि राजनीति समाजों को जोड़ने का माध्यम बने, न कि उन्हें बांटने का। देश तभी मजबूत होगा जब सभी जाति, वर्ग और समुदाय एक-दूसरे का सम्मान करेंगे। व्यक्तिगत प्रसिद्धि या राजनीतिक लाभ के लिए समाजों के बीच कटुता फैलाने वाले बयान राष्ट्रहित के लिए नुकसानदायक साबित हो सकते हैं।
भारत की शक्ति उसकी विविधता और एकता में निहित है। यदि समाज आपस में बंटेगा तो राष्ट्र कमजोर होगा। इसलिए सभी राजनीतिक दलों और नेताओं को संयमित भाषा का प्रयोग करना चाहिए तथा ऐसे बयानों से बचना चाहिए जो सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुंचाते हों।
राष्ट्र सर्वोपरि है और राष्ट्र की मजबूती सामाजिक समरसता से ही संभव है। समाज सुरक्षित रहेगा तभी देश सुरक्षित रहेगा। यही भारत की संस्कृति है और यही लोकतंत्र की असली ताकत भी।









