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*पितृ और वास्तु का संबंध क्या है?* *वास्तु = स्थान का विज्ञान, पितृ = जीवन का आधार* *एक विशेष प्रस्तुतीकरण दिनांक 26 सितम्बर 2026 से पितृपक्ष प्रारंभ* *संकलन विश्लेषण लेख पंडित कुंजबिहारी वशिष्ठ ज्योतिषाचार्य सूर्यदेव उपासक*

सुन्दर लाल शर्मा गौतम बुद्ध नगर

 

वास्तु कहता है घर की ऊर्जा सही हो तो पीढ़ियां फलती-फूलती हैं। पितृ परंपरा कहती है पूर्वजों की कृपा हो तो घर में बरकत रहती है। दोनों का लक्ष्य एक ही है – *स्थिरता, सुरक्षा और वंश वृद्धि।*

जब घर का पितृ-स्थान दूषित होता है, तो पितृ दोष जैसे लक्षण दिखते हैं – काम में रुकावट, अकारण कलह, धन टिकना बंद, अकाल मृत्यु, दुर्घटना होना, घर में बिमारी होना और वो लंबे समय तक चलना। इसलिए वास्तु में पितृ स्थान को सबसे पवित्र रखा जाता है।

पितृ से संबंधित मुख्य दिशाएं – वास्तु अनुसार

*1. दक्षिण दिशा – मुख्य पितृ दिशा*

– यम की दिशा है, पितरों का आधिपत्य।

– पितृ पक्ष में दक्षिण मुख होकर तर्पण इसी कारण किया जाता है।

*2. दक्षिण-पश्चिम – नैऋत्य कोण – सबसे महत्वपूर्ण*

– ये पितरों का स्थायी स्थान है इसको हम पितृ पद भी बोलते हैं।

– यहाँ भारीपन, स्थिरता होनी चाहिए। इसी कोने में पूर्वजों की फोटो लगाना सबसे शुभ माना जाता है।

– ये कोना दूषित हो तो पितृ दोष सबसे ज्यादा प्रभाव दिखाता है। साथ में राहु भी डिस्टर्ब हो जाता है जिससे असंतोष की भावना घर जाती है या यूं भी कह सकते है जीवन नीरस और खाली सा हो जाता है।

 

*3. दक्षिण-पश्चिम और पश्चिम का मध्य*

– कुछ आचार्य इस भाग को भी पितृ ऊर्जा का संग्रह-स्थल मानते हैं।

वास्तु में पितृ के लिए क्या करें – क्या न करें

*क्या करें:*

– पितरों की फोटो हमेशा *दक्षिण दीवार पर, उत्तर मुखी* लगाएं, वो भी नैऋत्य कोने में।

– पितृ पक्ष में उस कोने में रोज़ शाम को घी का दीया जलाएं।

– नैऋत्य कोण को हमेशा साफ, भारी और ऊंचा रखें।

*क्या न करें:*

– पितरों की फोटो कभी भी ईशान कोण (उत्तर-पूर्व), रसोई या बेडरूम में न लगाएं।

– दक्षिण-पश्चिम में टॉयलेट, किचन या मुख्य द्वार का होना बड़ा वास्तु दोष है जो पितृ दोष को बढ़ाता है।

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