सोच बदलें, तभी बदलेगा देश: सरकारी नौकरी नहीं, कार्य संस्कृति सबसे बड़ी जिम्मेदारी
सुन्दर लाल शर्मा गौतम बुद्ध नगर

गाजियाबाद। आज एक मित्र से मिलने के लिए मैं नवयुग मार्केट स्थित डाकघर पहुँचा। वहाँ का दृश्य देखकर मन में कई सवाल उठे। डाकघर में लोगों की लंबी कतार लगी हुई थी। बुजुर्ग, महिलाएँ, छात्र और नौकरीपेशा लोग अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। लेकिन काउंटर पर बैठा लगभग 25 वर्षीय एक कर्मचारी कंप्यूटर पर इतनी धीमी गति से कार्य कर रहा था कि ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो कोई 80 वर्षीय बुजुर्ग उससे कहीं अधिक तेजी से काम कर सकता हो। सबसे आश्चर्यजनक बात यह थी कि उसके चेहरे पर कतार में खड़े लोगों की परेशानी का कोई असर दिखाई नहीं दे रहा था।
यह दृश्य देखकर कॉलेज के दिनों की एक बात याद आ गई। उस समय कई शिक्षित युवा रोजगार की तलाश में दिनभर भटकते थे। नौकरी न मिलने पर वे व्यवस्था को कोसते थे। घर लौटकर कहते थे कि सरकारी तंत्र भ्रष्ट है, सरकारी कार्यालयों में काम नहीं होता, कर्मचारी लापरवाह हैं और आम जनता को परेशान किया जाता है। वे स्वयं को ईमानदार, मेहनती और देश के प्रति समर्पित बताते थे तथा दावा करते थे कि यदि उन्हें अवसर मिला तो वे व्यवस्था बदल देंगे।
लेकिन विडंबना यह है कि जब उन्हीं में से कुछ लोगों को सरकारी नौकरी मिल जाती है, तो कई बार वही व्यक्ति धीरे-धीरे उसी व्यवस्था का हिस्सा बन जाते हैं, जिसकी कभी आलोचना किया करते थे। समय की पाबंदी, जनता के प्रति संवेदनशीलता और सेवा भाव पीछे छूट जाता है। कई मामलों में काम में लापरवाही, लोगों को अनावश्यक इंतजार कराना और भ्रष्टाचार जैसी शिकायतें भी सामने आने लगती हैं।
सरकारी नौकरी केवल वेतन प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि जनता की सेवा का दायित्व है। प्रत्येक कर्मचारी की कुर्सी के पीछे हजारों नागरिकों की अपेक्षाएँ जुड़ी होती हैं। यदि एक कर्मचारी अपनी जिम्मेदारी ईमानदारी, दक्षता और संवेदनशीलता के साथ निभाए, तो न केवल लोगों का समय बचेगा बल्कि सरकारी संस्थानों पर जनता का विश्वास भी मजबूत होगा।
देश बदलने की शुरुआत बड़े भाषणों या केवल सरकार बदलने से नहीं होती। बदलाव तब आता है जब हर व्यक्ति अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करे। यदि हम अपने कार्यस्थल पर पूरी निष्ठा, समयबद्धता और सेवा भावना के साथ काम करें, तो व्यवस्था अपने आप बेहतर होने लगेगी।
देश को बदलने के लिए सबसे पहले अपनी सोच बदलनी होगी। जब हम दूसरों से अपेक्षा करने के बजाय स्वयं उदाहरण बनेंगे, तभी वास्तव में एक जिम्मेदार, ईमानदार और विकसित भारत का निर्माण संभव होगा।









