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आखिर क्यों ब्रह्मांड के नायक जगन्नाथ को अपने ही मंदिर के नियम क्यों तोड़ने पड़े? क्या गलती की थी उन पुजारियों ने? और कौन था वो अछूत भक्त जिसकी एक जिद ने भगवान को पत्थर से बाहर खींच लिया।

सुन्दर लाल शर्मा गौतम बुद्ध नगर

नमस्कार दोस्तों। यह कोई कहानी नहीं यह 16वीं सदी का वो सच है जिसे सुनकर आज भी विज्ञान चुप हो जाता है। इस घटना को समझने के लिए हमें चलना होगा उस दौर में जहां एक भक्त की अग्नि परीक्षा ली जा रही थी। कहानी की शुरुआत होती है उड़ीसा के एक छोटे से गांव बाली गांव से जहां दासिया बावरी नाम का एक बुनकर रहता था। दासिया जाति से बावरी था जिसे उस जमाने में अछूत और नीची जाति माना जाता था। समाज का नियम इतना कठोर था कि अगर दासिया किसी ब्राह्मण की परछाई भी छू ले तो उसे महापाप समझा जाता था। दासिया का जीवन बहुत संघर्ष भरा था। दिन भर कड़ी धूप में कपड़े बुनना और रात को रूखा-सूखा खाकर सो जाना। लेकिन इस गरीबी के अंधेरे में उसके दिल में एक दीपक जल रहा था। प्रभु जगन्नाथ के नाम का दीपक। वो कपड़े बुनते समय ताने-बाने में भी सिर्फ एक ही लय सुनता था। जय जगन्नाथ जय जगन्नाथ। उसका एक ही सपना था पूरी धाम जाना। वह जानता था कि उसे मंदिर के अंदर नहीं जाने दिया जाएगा। उसे सिंह द्वार से भी दूर खड़ा रहना पड़ेगा। लेकिन उसकी आत्मा तड़पती थी कि काश काश एक बार वो उन चका नयन यानी प्रभु की बड़ी गोल आंखों को देख पाता। वो अक्सर रात को रोते हुए कहता हे प्रभु तुमने मुझे इस जाति में क्यों जन्म दिया? क्या मेरा प्यार तुम्हारे लिए कम है? लोग कहते हैं मैं अपवित्र हूं लेकिन मेरा मन तो तुम्हारे चरणों में पड़ा है। दोस्तों दासिया के पास धन नहीं था लेकिन उसके पास वो विश्वास था जो आज हम करोड़ों रुपए खर्च करके भी नहीं खरीद सकते। एक दिन दासिया को पता चला कि उसके गांव के कुछ ब्राह्मण पूरी यात्रा के लिए जा रहे हैं। दासिया का मन मचल उठा। उसके पास यात्रा के लिए पैसे नहीं थे और ना ही साथ जाने की अनुमति। वह दौड़कर अपने घर गया। अपनी पुरानी झोपड़ी के कोने में उसने कुछ सिक्के छिपा कर रखे थे। उसकी महीनों की कमाई। वो उन सिक्कों को लेकर बाजार गया और वहां से एक नारियल खरीदा। वो दौड़ता हुआ उन ब्राह्मणों के पास पहुंचा और उनके चरणों में गिर पड़ा। उसने कांपते हाथों से वह नारियल आगे बढ़ाया और कहा, हे ब्राह्मण देव, मैं तो अभागा हूं। प्रभु के पास नहीं जा सकता। क्या आप मेरा यह छोटा सा उपहार मेरे जगन्नाथ तक पहुंचा देंगे? ब्राह्मणों ने एक दूसरे को देखा और हंसने लगे। एक ब्राह्मण ने कहा, अरे दासिया हम पवित्र मंदिर में जा रहे हैं और तू चाहता है कि हम तेरा छुआ नारियल भगवान को चढ़ाएं। तब दासिया ने जो कहा उसे ध्यान से सुनिए। उसने कहा महाराज मैं जानता हूं मैं अपवित्र हूं। इसलिए मेरी एक शर्त है। आप मंदिर में जाना भगवान को भोग लगाना। लेकिन मेरा नारियल तभी देना जब भगवान जगन्नाथ खुद अपने हाथ बढ़ाकर इसे मांगे। अगर वह हाथ ना बढ़ाएं तो मेरा नारियल वापस ले आना। मैं समझ लूंगा कि मेरा प्यार अभी कच्चा है। यह सुनते ही ब्राह्मण ठहाके लगाकर हंस पड़े। पागल हो गया है क्या? भगवान हाथ बढ़ाएंगे। अरे हम सालों से वेद पढ़ रहे हैं। हमसे तो कभी बात नहीं की और तेरे इस नारियल के लिए वो पत्थर की मूर्ति बन जाएंगे। मजाक उड़ाते हुए उन्होंने कहा, ठीक है, ठीक है, हम ले जाते हैं। अगर तेरे भगवान हाथ फैलाएंगे तो दे देंगे वरना वापस ले आएंगे। वे ब्राह्मण वहां से चले गए और दासिया वहीं धली में पड़ा जय जगन्नाथ जपता रहा। कई दिनों की यात्रा के बाद ब्राह्मण पुरी पहुंचे। मंदिर का माहौल दिव्य था। हजारों भक्त जय जगन्नाथ के नारे लगा रहे थे। ब्राह्मणों ने विधिविधान से पूजा की। भगवान को छप्पन भोग लगाए। अपनी विद्वता के अहंकार में वह भूल ही गए कि उनके झोले में गरीब का नारियल भी पड़ा है। जब पूजा समाप्त हुई और वे गर्भ गृह से बाहर निकलने लगे तभी एक ब्राह्मण को याद आया। उसने हंसते हुए अपने साथी से कहा, अरे रुको उस पागल दासिया का नारियल तो रह गया। तीसरे ने कहा छोड़ो भी उसे क्या पता चलेगा? चलो वापस चलते हैं। लेकिन पहले ने कहा नहीं चलो मजा लेते हैं। भगवान के सामने शर्त रखते हैं। देखते हैं भगवान कैसे हाथ बढ़ाते हैं। फिर गांव जाकर दासिया को चिढ़ाएंगे। वे वापस मुड़े। अब दृश्य बहुत गंभीर होने वाला है। मंदिर के अंदर पंडित और पुजारी मौजूद थे। उन ब्राह्मणों ने दासिया का नारियल निकाला और भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियों की तरफ करके जोर से कहा, हे प्रभु, तुम्हारे उस परम भक्त दासिया ने यह भेजा है। उसकी जिद थी कि तुम इसे अपने हाथ से लो। अब बताओ क्या तुम इस अछूत का नारियल लोगे या हम इसे बाहर फेंक दें? वहां खड़े सभी पुजारी हंसने लगे। पत्थर की मूरत कहीं हाथ बढ़ाती है। यह कलयुग है भाई। यहां चमत्कार नहीं होते। ब्राह्मण ने नारियल वापस अपने झोले में रखने के लिए हाथ पीछे खींचा। उसने सोचा बस बहुत हुआ मजाक लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। तभी अचानक मंदिर के गर्भ गृह में एक अजीब सी कंपन महसूस हुई। हवा का एक तेज झोंका आया और मंदिर के बड़े-बड़े दिए बुझने की कगार पर आ गए। पुजारियों की हंसी एकदम से रुक गई। सन्नाटा छा गया। सबने देखा कि भगवान जगन्नाथ की मूर्ति से एक दिव्य सुनहरा तेज निकल रहा है और फिर दर्शकों वो हुआ जो मानव इतिहास में कभी नहीं हुआ था। गर्भ गृह की पत्थर की दीवार में अचानक दरार पड़ने लगी। कण-कण की आवाज के साथ पत्थर अपनी जगह छोड़ने लगे। वहां खड़े ब्राह्मण डर के मारे पीछे गिर पड़े। उनकी आंखें फटी की फटी रह गई। उस दीवार के बीचोंबीच से साक्षात प्रभु जगन्नाथ का एक विशाल हाथ बाहर निकला। वो हाथ ना तो पत्थर का था ना ही लकली का। वो एक सजीव दिव्य हाथ था जिस पर सोने के कंगन चमक रहे थे। वो हाथ सीधा उस ब्राह्मण की तरफ बढ़ा जिसके हाथ में नारियल था। ब्राह्मण का शरीर कांप रहा था। पसीने छूट रहे थे। उसने कांपते हाथों से वह नारियल भगवान की हथेली पर रख दिया। जैसे ही नारियल रखा गया, भगवान का हाथ धीरे-धीरे पीछे गया और वापस दीवार में समा गया। दीवार फिर से वैसी ही हो गई जैसे कुछ हुआ ही ना हो। लेकिन वहां मौजूद हर एक व्यक्ति जमीन पर लेट कर रो रहा था। उनका अहंकार, उनका ज्ञान, उनका जातिपाती का घमंड सब उस एक पल में चकनाचूर हो गया था। उधर गांव में बैठे दासिया को उसी पल सुधा गई। उसे हवाओं में अपने प्रभु की सुगंध महसूस हुई। वो समझ गया कि उसके नाथ ने उसकी भेंट स्वीकार कर ली है। जब ब्राह्मण वापस गांव लौटे तो वे दासिया के चरणों में गिर पड़े। उन्होंने कहा दासिया तू अछूत नहीं है। तू तो हमसे भी बड़ा ब्राह्मण है। हमने तो सिर्फ पत्थर देखा। तूने उस पत्थर में प्राण जगा दिए। दोस्तों यह कहानी सिर्फ एक किस्सा नहीं है। आज भी अगर आप पूरी जाएं तो मंदिर की दीवार पर वह स्थान देख सकते हैं। यह प्रमाण है कि ईश्वर के लिए कोई छोटा या बड़ा नहीं होता। भगवान जगन्नाथ ने उस दिन साबित कर दिया कि वह महलों में नहीं भक्त के भाव में रहते हैं। अगर आज इस कहानी ने आपकी आंखों में आंसू ला दिए हैं तो समझ लीजिए कि जगन्नाथ जी ने आपको भी छू लिया है। कमेंट बॉक्स में अपनी हाजिरी लगाइए और जोर से लिखिए जय जगन्नाथ। इस पोस्ट को अपने परिवार के साथ शेयर करें ताकि भक्ति की यह लौ सब तक पहुंचे। चैनल को फॉलो करना ना भूलें। मिलते हैं अगली अद्भुत कहानी में।

जय जगन्नाथ जी , मित्र ब्राह्मण संत समाज आप जन जन का कल्याण करो, कोई जातिवाद से अधिक सोच को छोटा निम्न प्रकार ना दो। इस जीवन भगवान यदि मिलेगे, तो भक्त स्वरूप केवट, निषाद, शबरी, मतंग जैसे परमानन्द संत योगीजी, मोदीजी के प्रजावत्सल हृदय मे आज कलयुग मे होने वाले भगवान हनुमान के अडिग निष्ठावान भक्त परशुराम महादेव ,कलन्की अवतार मे नही अपने सभ्य लोकहित व्यवहार युक्त भक्त भगवान मे देख सकोगे। श्रीकृष्ण गोविन्दाय प्रभु पुरूषोत्तम श्रीराम भक्त हनुमान निष्ठावान भक्त शबरी के लिए सदैव तत्पर रहे। संकलनकर्ता पंडित कुंजबिहारी वशिष्ठ ज्योतिषाचार्य सूर्यदेव उपासक मुरादनगर

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